Sunday, 22 September 2013

मशरूम की खेती

मशरूम की खेती के छह चरणों के होते हैं , और डिवीजनों कुछ मनमाने ढंग से कर रहे हैं , हालांकि , इन चरणों का एक उत्पादन प्रणाली के रूप में करने की जरूरत है पहचान .


छह चरणों मैं खाद , द्वितीय चरण खाद , स्पॉन , आवरण लगाए , और फसल चरण हैं . ये कदम हर कदम के भीतर मुख्य विशेषताओं पर बल है , उनके प्राकृतिक रूप से उत्पन्न अनुक्रम में वर्णित हैं . खाद मशरूम विकसित करने के लिए आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है . सामग्री के दो प्रकार के आम तौर पर मशरूम खाद , सबसे अधिक इस्तेमाल किया और कम से कम महंगा होने के गेहूं के भूसे बिस्तर वाले घोड़े खाद के लिए उपयोग किया जाता है . शब्द अक्सर प्रमुख घटक घोड़ा खाद नहीं है जहां किसी भी मशरूम खाद को संदर्भित करता है , हालांकि सिंथेटिक खाद आमतौर पर , घास और कुचल corncobs से बनाया गया है . खाद के दोनों प्रकार के नाइट्रोजन की खुराक के अलावा और एक कंडीशनिंग एजेंट , जिप्सम की आवश्यकता होती है

लाख, या लाह

                                                            लाख, या लाह

 लाख, या लाह संस्कृत के ' लाक्षा ' शब्द से व्युत्पन्न समझा जाता है। संभवत: लाखों कीड़ों से उत्पन्न होने के
कारण इसका नाम लाक्षा पड़ा था।
लाख एक प्राकृतिक राल है बाकी सब राल कृत्रिम हैं। इसी कारण इसे 'प्रकृति का वरदान' कहते हैं। लाख के कीट अत्यन्त सूक्ष्म होते हैं तथा अपने शरीर से लाख उत्पन्न करके हमें आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं। वैज्ञानिक भाषा में लाख को 'लेसिफर लाखा' कहा जाता है। 'लाख' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'लक्ष' शब्द से हुई है, संभवतः इसका कारण मादा कोष से अनगिनत (अर्थात् लक्ष) शिशु कीड़ों का निकलना है। लगभग 34 हजार लाख के कीड़े एक किग्रा. रंगीन लाख तथा 14 हजार 4 सौ लाख के कीड़े एक किग्रा. कुसुमी लाख पैदा करते हैं।
अनुक्रम  [छुपाएँ]
1 इतिहास
2 उपयोग
3 उत्पादन
4 इन्हें भी देखें
5 बाहरी कड़ियाँ
इतिहास[संपादित करें]

प्रागैतिहासिक समय से ही भारत के लोगों को लाख का ज्ञान है। अथर्ववेद में भी लाख की चर्चा है। महाभारत में लाक्षागृह का उल्लेख है, जिसको कौरवों ने पांडवों के आवास के लिए बनवाया था। कौरवें का इरादा लाक्षागृह में आग लगाकर पांडवों को जलाकर मार डालने का था। ग्रास्या द आर्टा (Gracia de Orta, 1563 ई) में भारत में लाख रंजक और लाख रेज़िन के उपयोग का उल्लेख किया है। आइन-ए-अकबरी (1590 ई.) में भी लाख की बनी वार्निश का वर्णन है, जो उस समय चीजों को रँगने में प्रयुक्त होती थी। टावन्र्यें (Tavernier) ने अपने यात्रावृतांत (1676 ई.) में लाख रंजक का, जो छींट की छपाई में, और लाख रेज़िन का, जो ठप्पा देने की लाख में और पालिश निर्माण में प्रयुक्त होता था, उल्लेख किया है।
उपयोग[संपादित करें]

लाख के वे ही उपयोग हैं जो चपड़े के हैं। लाख के शोधन से, और एक विशेष रीति से चपड़ा तैयार होता है। चपड़ा बनाने से पहले लाख से लाख रंजक निकाल लिए जाते हैं। लाख ग्रामोफोन रेकार्ड बनाने में, विद्युत् यंत्रों में, पृथक्कारी के रूप में, वार्निश और पॉलिश बनाने में, विशेष प्रकार की सीमेंट और स्याही के बनाने में, शानचक्रों में चूर्ण के बाँधने के काम में, ठप्पा देने की लाख बनाने इत्यादि, अनेक कामों में प्रयुक्त होता है। भारत सरकार ने राँची के निकट नामकुम में लैक रिसर्च इंस्टिट्यूट की स्थापना की है, जिसमें लाख से संबंधित अनेक विषयों पर अनुसंधान कार्य हो रहे हैं। इस संस्था का उद्देश्य है उन्नत लाख उत्पन्न करना, लाख की पैदावर को बढ़ाना और लाख की खपत अधिक हो और निर्यात के लिए विदेशों की माँग पर निर्भर रहना न पड़े।
आज की लाख का उपयोग ठप्पा देने का चपड़ा बनाने, चूड़ियों और पालिशों के निर्माण, काठ के खिलौनों के रँगने और सोने चाँदी के आभूषणों में रिक्त स्थानों को भरने में होता है। लाख की उपयोगिता का कारण उसका ऐल्कोहॉल में घुलना, गरम करने पर सरलता से पिघलना, सतहों पर दृढ़ता से चिपकना, ठंडा होने पर कड़ा हो जाना और विद्युत् की अचालकता है। अधिकांश कार्बनिक विलयकों का यह प्रतिरोधक होता है और अमोनिया तथा सुहागा सदृश दुर्बल क्षारों के विलयन में इसमें बंधन गुण आ जाता है।
19वीं शताब्दी तक लाख का महत्व लाख रंजकों के कारण था, पर सस्ते संश्लिष्ट रंजकों के निर्माण से लाख रंजक का महत्व कम हो गया। मनोरम आभा, विशेषकर रेशम के वस्त्रों में, उत्पन्न करने की दृष्टि से लाख रंजक आज भी सर्वोत्कृष्ट समझा जाता है, पर महँगा होने के कारण न अब बनता है और न बिकता है। आज लाख का महत्व उसमें उपस्थित रेज़िन के कारण है, किंतु अब सैकड़ों सस्ते रेज़िनों का संश्लेषण हो गया है और ये बड़े पैमाने पर बिकते हैं। किसी एक संश्लिष्ट रेज़िन में वे सब गुण नहीं हैं जो लाख रेज़िन में हैं। इससे लाख रेज़िन की अब भी माँग है, पर कब तक यह माँग बनी रहेगी, यह कहना कठिन है। कुछ लोगों का विचार है कि इसका भविष्य तब तक उज्वल नहीं है जब तक इसका उत्पादनखर्च पर्याप्त कम न हो जाए। लाख में एक प्रकार का मोम भी रहता है, जिसे लाख मोम कहते हैं।
उत्पादन[संपादित करें]

लाख, कीटों से उत्पन्न होता है। कीटों को लाख कीट, या लैसिफर लाक्का (Laccifer lacca) कहते हैं। यह कॉक्सिडी (Coccidae) कुल का कीट है। यह उसी गण के अंतर्गत आता है जिस गण का कीट खटमल है। लाख कीट कुछ पेड़ों पर पनपता है, जो भारत, बर्मा, इंडोनेशिया तथा थाइलैंड में उपजते हैं। एक समय लाख का उत्पादन केवल भारत और बर्मा में होता था। पर अब इंडोनेशिया तथा थाइलैंड में भी लाख उपजाया जाता है और बाह्य देशों, विशेषत: यूरोप एवं अमरीका, को भेजा जाता है।
पचासों पेड़ हैं, जिनपर लाख कीट पनप सकते हैं, पर भारत में जिन पेड़ों पर लाख उगाया जाता है, ये हैं-
कुसुम (Schleichera trijuga),
खैर (Acacia catechu),
बेर (Ziziphus jujuba),
पलाश (Butea frondosa),
घोंट (Zizphus xylopyra) के पेड़ और
अरहर (Cajanus indicus) के पौधे,
शीशम (Dalbergia latifolia),
पंजमन (Ougeinia dalbergioides),
सिसि (Albizzia stipulata),
पाकड़ (Ficus infectoria),
गूलर (Ficus glomerata),
पीपल (Ficus religiosa),
बबूल (Acacia arabica),
पोर हो और
शरीफा इत्यादि
लाख की अच्छी फसल के लिए पेड़ों को खाद देकर उगाया जाता है और काट-छाँटकर तैयार किया जाता है। जब नए प्ररोह निकलकर पर्याप्त बड़े हो जाते हैं तब उनपर लाख बीज बैठाया जाता है।
लाख की दो फसलें होती हैं। एक को कतकी-अगहनी कहते हैं तथा दूसरी को बैसाखी-जेठवीं कहते हैं। कार्तिक, अगहन, बैशाख तथा जेठ मासों में कच्ची लाख एकत्र किए जाने के कारण फसलों के उपर्युक्त नाम पड़े हैं। जून-जुलाई में कतकी-अगहनी की फसल के लिए और अक्टूबर नवंबर में बैसाखी-जेठवी फसलों के लिए लाख बीज बैठाए जाते हैं। एक पेड़ के लिए लाख बीज दो सेर से दस सेर तक लगता है और कच्चा लाख बीज से ढाई गुना से लेकर तीन गुना तक प्राप्त होता है। अगहनी और जेठवी फसलों से प्राप्त कच्चे लाख को "कुसुमी लाख" तथा कार्तिक एवं बैसाख की फसलों से प्राप्त कच्चे लाख को "रंगीनी लाख" कहते हैं। अधिक लाख रंगीनी लाख से प्राप्त होती है, यद्यपि कुसमी लाख से प्राप्त लाख उत्कृष्ट कोटि की होती है। लाख की फसल "एरी" हो सकती है, या "फुंकी"। कीटों के पोआ छोड़ने के पहले यदि लाखवाली टहनी काटकर उससे लाख प्राप्त की जाती है, तो उस लाख को "एरी" लाख कहते हैं। एरी लाख में कुछ जीवित कीट, परिपक्व या अपरिपक्व अवस्थाओं में, रहते हैं। कीटों के पोआ छोड़ने के बाद जो टहनी काटी जाती है, उससे प्राप्त लाख को "फुंकी" लाख कहते हैं। फुंकी लाख में लाख के अतिरिक्त मृत मादा कीटों के अवशेष भी रहते हैं।
इन्हें भी देखें[संपादित करें]

चपड़ा
बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

भारतीय प्राकृतिक राल एवं गोंद संस्थान, राँची
महामाया लाख फार्मिंग कम्पनी
किसानों को मालामाल करेगी लाख की खेती
लाख की खेती बनायेगी लखपति
छत्तीसगढ़ में खुलेगा लाख प्रसंस्करण केन्द (अगस्त, २०१२)
दमोह जिले में लाख की खेती की शुरुआत
Picture of lac insect
Drawing of insect, its larva and a colony
http://www.szgdocent.org/resource/ff/f-arth3a.htm
http://www.beadnshop.com/lac-kashmiri-beads/ Beads and other products produced with the help of lac. Manufacturing process and information on site.
http://www.jatropha.de/ The Jatropha Website, for production in Mexico
श्रेणी: 

मशरूम


आवश्यक सामग्री:1) पैडी स्ट्रॉ : स्थानीय धान की पुआल धान के पुआल मशरूम की खेती के लिए
आम तौर पर अच्छा है . सफेद primodia , साथ धान की किस्म से विशेष रूप से पुआल , संकीर्ण कड़ा और संयुक्त राष्ट्र threshed ( बैल या ट्रैक्टर द्वारा ) की आवश्यकता है . धान की पुआल जब बैल या ट्रैक्टर , ढीला कठोरता से दलित और यह पानी के संपर्क में आता है जब आसानी से rots , मशरूम mycelia विकास के लिए अच्छा नहीं है जो संकुचित हो जाता है . हाथ से पुआल के बंडलों से हराकर कटाई के माध्यम से प्राप्त ऐसे पुआल हमेशा मशरूम की खेती के लिए अच्छे हैं . केवल ऊपर और पुष्पगुच्छ हिस्से को निकाल दिया जाता है . धान की पुआल जमीनी स्तर से "6 " केवल 4 छोड़ने काटा जाना चाहिए . कवक प्रजातियों पर बाद में सड़ और पुआल के संक्रमण के कारण होता है , जो आधार भाग में पाया जाता है, क्योंकि यह है . धान की पुआल किस्म CR1014 , 1242 , 141 , T90 से , 2 फुट लंबाई की मशरूम beds.A मशरूम बिस्तर , 2 फीट चौड़ा और 2 फीट ऊंचाई की मोटाई के अनुसार 10 से पुआल के 20 बंडलों के लिए तैयार है की तैयारी के लिए अच्छा है पुआल के बंडलों . पहले पुआल गठरी के शीर्ष पर पकड़ और पत्तियों बाहर आने ऐसा करने से पुआल गठरी के बंधन ढीला. पत्तियों रहेगा , तो यह लंबे समय के लिए और अधिक पानी पकड़ और जल्द ही भूसे के सड़ कारण होगा .
 
2) मशरूम स्पोन : मशरूम अंडे की मशरूम 350 से 400 ग्राम ( बीज ) की आवश्यकता की एक बिस्तर के लिए . संस्कृति संक्रमण से मुक्त किया जाना चाहिए .
 
3) पोषण: धान के पुआल मशरूम , bengalgram का पाउडर , दाल , horsegram , लाल चना , blackgram या हरा चना और गेहूं की भूसी और धान की भूसी की खेती के लिए प्रयोग किया जाता है . इसके बीज कोट के साथ bengalgram से प्राप्त पाउडर बीज कोट के साथ bengalgram की अधिक उपज के फार्म का पाउडर देता है .

 
सामग्री मशरूम की एक बिस्तर तैयार करने की आवश्यकता :
 
स्ट्रॉ गठरी : - पुआल या 15 किलो का 15-20 बंडलों ( बंडल के प्रति मोटाई के रूप में)
 
मशरूम स्पोन ( बीज ) : - एक बोतल या 350 ग्राम
 
पोषण: - चने की दाल या लाल चने की 250 ग्रामबिस्तर साइज : - 2 फुट एक्स 2 फीट या 2.5 फुट x 2.5 फीटअंतरिक्ष: - 3ft एक्स 3ft या 4ft एक्स 4ft ( 10 वर्ग फुट के लिए 16 वर्ग फुट)
 
खेती की विधि:
 
1) पुआल गठरी की पत्तियों को हटा दें और एक भूसे कटर के साथ 2ft आकार में कटौती . पुआल के बंडलों की संख्या 12 से 16 घंटे के लिए स्वच्छ पानी की एक टंकी में भिगो कर रहे हैं . खाइयों से पानी , गंदे हैं जो तालाबों आदि नहीं किया जाना चाहिए .

Wednesday, 18 September 2013

अरहर

अरहर की दाल को तुवर भी कहा जाता है। इसमें खनिज, कार्बोहाइड्रेट, आयरन, केल्शियम आदि पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। यह सुगमता से पचने वाली दाल है, अतः रोगी को भी दी जा सकती है, परंतु गैस, कब्ज एवं साँस के रोगियों को इसका सेवन कम ही करना चाहिए।




अरहर दाल का पेद़्अ बहुवर्षीय होता है, और छोटे पेड़ के रूप में निकलता है


अरहर के बीज
अंग्रेज़ी में: pigeon pea (Cajanus cajan, syn. Cajanus indicus) बांग्ला: अरहर असमी: रोहोर नेपाली: रहर गुजराती/मराठी/पंजाबी: तूर/तूवर तमिल: तुवरम परुप्पू (துவரம்பருப்பு), मलयालम: तूवर परुप्पू ("തുവര പരിപ്പ്" ), कन्नड़: तोगड़ी तेलुगु: कांडी
परिचय[संपादित करें]

यह पूर्व उत्तरी भारत के दलहन की मुख्य फसल है। पूर्वी उत्तरप्रदेश में तो दाल माने अरहर की दाल। यह केवल उत्तर प्रदेश में ३० लाख एकड़ से अधिक रकबे में बोई जाती है। इसके लिये नीची तथा मटियार भूमि को छोड़कर सभी जमीनें उपयुक्त हैं। ऊँची दूमट भूमि में, जहाँ पानी नहीं भरता, यह फसलश् विशेष रूप से अच्छी होती है। य बहुधा वर्षा ऋतु के आरंभ में और खरीफ की फसलों के साथ मिलाकर बोई जाती है। अरहर के साथ कोदो, बगरी-धान, ज्वार, बाजरा, मूँगफली, तिल आदि मिलाकर बोते हैं। वर्षा के अंत में ये फसलें पक जाती है और काट ली जाती हैं। इसके बाद जाड़े में अरहर बढ़कर खेत को पूर्णतया भर लेती है तथा रबी की फसलों के साथ मार्च के महीने में तैयार हो जाती है। पकने पर इसकी फसल काटकर दाने झाड़ लिए जाते हैं। और फसलों के साथ मिलाकर इसका बीज केवल दो सेर प्रति एकड़ के हिसाब से डाला जाता है। अरहर को वर्षा के पहले दो महीनों में यदि निकाई व गोड़ाई दो तीन बार मिल जाय, तो इसका पौधा बहुत बढ़ता है और पैदावार भी लगभग दूनी हो जाती है। चने की तरह इसकी जड़ों में भी हवा से खाद नाइट्रोजन इकट्ठा करने की क्षमता होती है। अरहर बोने से खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और इसे स्वयं खाद की आवश्यकता नहीं होती। इसको पानी की भी अधिक आवश्यकता नहीं होती। जब धान इत्यादि पानी की कमी से मर तथा मुर्झा जाते हैं तब भी अरहर खेत में हरी खड़ी रहती है। कमजोर अरहर की फसल पर पाले का असर कभी कभी हो जाता है, परंतु अच्छी फसल पर, जो बरसात में गोड़ाई के कारण मोटी हो गई है, पाले का भी असर बहुत कम, या नहीं, होता।
संदर्भ

Saturday, 14 September 2013

कृषि

कृषि खेती और वानिकी के माध्यम से खाद्य और अन्य सामान के उत्पादन से सम्बंधित है। कृषि एक मुख्य विकास था, जो सभ्यताओं के उदय का कारण बना, इसमें पालतूजानवरों का पालन किया गया और पौधों (फसलों) को उगाया गया, जिससे अतिरिक्त खाद्य का उत्पादन हुआ। इसने अधिक घनी आबादी और स्तरीकृत समाज के विकास को सक्षम बनाया। कषि का अध्ययन कृषि विज्ञान के रूप में जाना जाता है (इससे संबंधित अभ्यास बागवानी का अध्ययनहोर्टीकल्चर में किया जाता है)।
तकनीकों और विशेषताओं की बहुत सी किस्में कृषि के अर्न्तगत आती है, इसमें वे तरीके शामिल हैं जिनसे पौधे उगाने के लिए उपयुक्त भूमि का विस्तार किया जाता है, इसके लिए पानी के चैनल खोदे जाते हैं और सिंचाई के अन्य रूपों का उपयोग किया जाता है। कृषि योग्य भूमि पर फसलों को उगाना और चरागाहों और रेंजलैंड पर पशुधन को गड़रियों के द्वारा चराया जाना, मुख्यतः कृषि से सम्बंधित रहा है। कृषि के भिन्न रूपों की पहचान करना व उनकी मात्रात्मक वृद्धि, पिछली शताब्दी में विचार के मुख्य मुद्दे बन गए। विकसित दुनिया में यह रेंज जैविक कृषि (उदाहरण पर्माकल्चर या कार्बनिक कृषि) से लेकर गहन कृषि (उदाहरण औद्योगिक कृषि) तक फैली है।
आधुनिक एग्रोनोमीपौधों में संकरणकीटनाशकों और उर्वरकों, और तकनीकी सुधारों ने फसलों से होने वाले उत्पादन को तेजी से बढाया है, और साथ ही यह व्यापक रूप से पारिस्थितिक क्षति का कारण भी बना है और इसने मनुष्य के स्वास्थ्य पर ऋणात्मक प्रभाव डाला है। चयनात्मक प्रजनन और पशुपालनकी आधुनिक प्रथाओं जैसे गहन सूअर खेती (और इसी प्रकार के अभ्यासों को मुर्गी पर भी लागू किया जाता है) ने मांस के उत्पादन में वृद्धि की है, लेकिन इससे पशु क्रूरताएंटीबायोटिक दवाओं के स्वास्थ्य प्रभाव, वृद्धि होर्मोन, और मांस के औद्योगिक उत्पादन में सामान्य रूप से काम में लिए जाने वाले रसायनों के बारे में मुद्दे सामने आये हैं।
प्रमुख कृषि उत्पादों को मोटे तौर पर भोजनरेशाईंधनकच्चा मालफार्मास्यूटिकल्स, और उद्दीपकों में समूहित किया जा सकता है। साथ ही सजावटी या विदेशी उत्पादों की भी एक श्रेणी है। 2000 से, पौधों का उपयोग जैविक ईंधनजैवफार्मास्यूटिकल्सजैवप्लास्टिक,[1] और फार्मास्यूटिकल्स [2] के उत्पादन में किया जा रहा है। विशेष खाद्यों में शामिल हैं अनाजसब्जियांफल और मांस। रेशे में कपासऊन,सनरेशम और फ्लैक्स शामिल हैं। कच्चे माल में लकड़ी और बाँस शामिल हैं। उद्दीपकों में तंबाकू,शराबअफीमकोकीन, और डिजिटेलिस शामिल हैं।पौधों से अन्य उपयोगी पदार्थ भी उत्पन्न होते हैं, जैसे रेजिन। जैव ईंधनों में शामिल हैं बायोमास से मेथेनएथेनोल और जैव डीजलकटे हुए फूलनर्सरी के पौधे, उष्णकटिबंधीय मछलियां और व्यापार के लिए पालतू पक्षी, कुछ सजावटी उत्पाद हैं।
2007 में, दुनिया के लगभग एक तिहाई श्रमिक कृषि क्षेत्र में कार्यरत थे। हालांकि, औद्योगिकीकरण की शुरुआत के बाद से कृषि से सम्बंधित महत्त्व कम हो गया है, और 2003 में-इतिहास में पहली बार-सेवाक्षेत्र ने एक आर्थिक क्षेत्र के रूप में कृषि को पछाड़ दिया क्योंकि इसने दुनिया भर में अधिकतम लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया। [3] इस तथ्य के बावजूद कि कृषि दुनिया के आबादी के एक तिहाई से अधिक लोगों की रोजगार उपलब्ध कराती है, कृषि उत्पादन, सकल विश्व उत्पाद (सकल घरेलू उत्पाद का एक समुच्चय) का पांच प्रतिशत से भी कम हिस्सा बनता है। [4][मृत कड़ियाँ][5]

कृषि

कृषि खेती और वानिकी के माध्यम से खाद्य और अन्य सामान के उत्पादन से सम्बंधित है। कृषि एक मुख्य विकास था, जो सभ्यताओं के उदय का कारण बना, इसमें पालतू जानवरों का पालन किया गया और पौधों (फसलों) को उगाया गया, जिससे अतिरिक्त खाद्य का उत्पादन हुआ। इसने अधिक घनी आबादी और स्तरीकृत समाज के विकास को सक्षम बनाया। कषि का अध्ययन कृषि विज्ञान के रूप में जाना जाता है (इससे संबंधित अभ्यास बागवानी का अध्ययन होर्टीकल्चर में किया जाता है)।
तकनीकों और विशेषताओं की बहुत सी किस्में कृषि के अर्न्तगत आती है, इसमें वे तरीके शामिल हैं जिनसे पौधे उगाने के लिए उपयुक्त भूमि का विस्तार किया जाता है, इसके लिए पानी के चैनल खोदे जाते हैं और सिंचाई के अन्य रूपों का उपयोग किया जाता है। कृषि योग्य भूमि पर फसलों को उगाना और चरागाहों और रेंजलैंड पर पशुधन को गड़रियों के द्वारा चराया जाना, मुख्यतः कृषि से सम्बंधित रहा है। कृषि के भिन्न रूपों की पहचान करना व उनकी मात्रात्मक वृद्धि, पिछली शताब्दी में विचार के मुख्य मुद्दे बन गए। विकसित दुनिया में यह रेंज जैविक कृषि (उदाहरण पर्माकल्चर या कार्बनिक कृषि) से लेकर गहन कृषि (उदाहरण औद्योगिक कृषि) तक फैली है।
आधुनिक एग्रोनोमी, पौधों में संकरण, कीटनाशकों और उर्वरकों, और तकनीकी सुधारों ने फसलों से होने वाले उत्पादन को तेजी से बढाया है, और साथ ही यह व्यापक रूप से पारिस्थितिक क्षति का कारण भी बना है और इसने मनुष्य के स्वास्थ्य पर ऋणात्मक प्रभाव डाला है। चयनात्मक प्रजनन और पशुपालन की आधुनिक प्रथाओं जैसे गहन सूअर खेती (और इसी प्रकार के अभ्यासों को मुर्गी पर भी लागू किया जाता है) ने मांस के उत्पादन में वृद्धि की है, लेकिन इससे पशु क्रूरता, एंटीबायोटिक दवाओं के स्वास्थ्य प्रभाव, वृद्धि होर्मोन, और मांस के औद्योगिक उत्पादन में सामान्य रूप से काम में लिए जाने वाले रसायनों के बारे में मुद्दे सामने आये हैं।
प्रमुख कृषि उत्पादों को मोटे तौर पर भोजन, रेशा, ईंधन, कच्चा माल, फार्मास्यूटिकल्स, और उद्दीपकों में समूहित किया जा सकता है। साथ ही सजावटी या विदेशी उत्पादों की भी एक श्रेणी है। 2000 से, पौधों का उपयोग जैविक ईंधन, जैवफार्मास्यूटिकल्स, जैवप्लास्टिक,[1] और फार्मास्यूटिकल्स [2] के उत्पादन में किया जा रहा है। विशेष खाद्यों में शामिल हैं अनाज, सब्जियां, फल और मांस। रेशे में कपास, ऊन, सन, रेशम और फ्लैक्स शामिल हैं। कच्चे माल में लकड़ी और बाँस शामिल हैं। उद्दीपकों में तंबाकू, शराब, अफीम, कोकीन, और डिजिटेलिस शामिल हैं।पौधों से अन्य उपयोगी पदार्थ भी उत्पन्न होते हैं, जैसे रेजिन। जैव ईंधनों में शामिल हैं बायोमास से मेथेन, एथेनोल और जैव डीजल।कटे हुए फूल, नर्सरी के पौधे, उष्णकटिबंधीय मछलियां और व्यापार के लिए पालतू पक्षी, कुछ सजावटी उत्पाद हैं।
2007 में, दुनिया के लगभग एक तिहाई श्रमिक कृषि क्षेत्र में कार्यरत थे। हालांकि, औद्योगिकीकरण की शुरुआत के बाद से कृषि से सम्बंधित महत्त्व कम हो गया है, और 2003 में-इतिहास में पहली बार-सेवा क्षेत्र ने एक आर्थिक क्षेत्र के रूप में कृषि को पछाड़ दिया क्योंकि इसने दुनिया भर में अधिकतम लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया। [3] इस तथ्य के बावजूद कि कृषि दुनिया के आबादी के एक तिहाई से अधिक लोगों की रोजगार उपलब्ध कराती है, कृषि उत्पादन, सकल विश्व उत्पाद (सकल घरेलू उत्पाद का एक समुच्चय) का पांच प्रतिशत से भी कम हिस्सा बनता है। [4][मृत कड़ियाँ][5]

Sunday, 25 August 2013

जत्रोफा

जत्रोफा लगभग १७५ प्रजाति की वनस्पतियों का समूह है जिसमें झाडियां और पौधे सम्मिलित हैं। इसके पौधे भारत, अफ्रिका, उत्तरी अमेरिका, और कैरेबियन् जैसे ट्रापिकल क्षेत्रों में उत्पन्न होते हैं। यह एक बड़ा पादप है जो झाड़ियों के रूप में अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों में उगता है। इस पादप से प्राप्त होने वाले बीजों में 25-30 प्रतिशत तक तेल निकाला जा सकता है। इस तेल से कार आदि चलाये जा सकते हैं तथा जो अवशेष बचता है उससे बिजली पैदा की जा सकती है। जत्रोफा अनावृष्टि-रोधी सदाबहार झाडी है। यह कठिन परिस्थितियओं को भी झेलने में सक्षम है। अन्य नाम : रतनजोत, जंगली एरंडी, बंगरेड़ - हिन्दी कतमनक (Katamanak) - मलयालम कट्टमनक्कु (Kattamanakku) - तमिल पेपलम् (Pepalam) - तेलुगू कडहरलु (Kadaharalu) - कन्नड़ जेपाल (Jepal) - गुजराती भाषा कानन रण्ड - संस्कृत भाषा अनुक्रम 1 जत्रोफा की विशेषताएं 2 जत्रोफा के उपयोग 3 जत्रोफा का सामाजिक महत्व 4 जत्रोफा और पर्यावरण 5 भारत में जत्रोफा 6 बाह्य सूत्र जत्रोफा की विशेषताएं इसके बीज सस्ते हैं बीजों में तेल की मात्रा बहुत अधिक है (लगभग ३७%) इससे प्राप्त तेल का ज्वलन ताप (फ्लैश प्वाइंट) अधिक होने के कारण यह बहुत सुरक्षित भी है। १.०५ किग्रा जत्रोफा तेल से १ किग्रा बायोडिजल पैदा होता है। जत्रोफा का तेल बिना रिफाइन किये हुए भी इंधन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। जत्रोफा का तेल जलाने पर धुआंरहित स्वच्छ लौ पैदा करता है। थोडे ही दिनों (लगभग दो वर्ष) में इसके पौधे से फल प्राप्त होने लगते हैं उपजाऊ भूमि और खराब (उसर भूमि) भूमि, दोनो पर इसकी उपज ली जा सकती है कम वर्षा के क्षेत्रों (२०० मिमी) और अधिक वर्षा के क्षेत्रों, दोनों में यह जीवित रहता और फलता-फूलता है वहां भी इसकी पैदावार ली जा सकती है जहां दूसरी फसलें नही ली जा सकतीं। इसे नहरों के किनारे, सडकों के किनारे या रेलवे लाइन के किनारे भी लगा सकते हैं। यह कठिन परिस्थितियों को भी सह लेता है। इसकी खेती के लिये किसी प्रकार की विशेषज्ञता की आवश्यकता नहीं होती। इसके पौधे की उंचाई भी फल और बीज इकट्ठा करने की दृष्टि से बहुत उपयुक्त है - जमीन पर खडे होकर ही फल तोडे जा सकते हैं। फल वर्षा ऋतु आरम्भ होने के पाले ही पक जाते हैं, इसलिये भी फल इकट्ठा करना आसान काम है। इसके पौधा लगभग ५० वर्ष तक फल पैदा करता है। बार-बार फसल लगाने की आवश्यकता नहीं होती। इसको लगाना आसान है, यह तेजी से बढता है, और इसको देखरेख की बहुत कम जरूरत होती है। इसको जानवर नही खाते और कीट नही लगते। इस कारण इसकी विशेष देखभाल नहीं करनी पडती। यह् किसी भी पसल का प्रतिस्पर्धी नहीं है, बल्कि यह उन फसलों की पैदावार बढाने में मदद करता है। जत्रोफा के उपयोग जत्रोफा के करीब १६०० उपयोग गिनाये गये हैं। इसके पौधे भू-क्षरण रोकने के लिये भी काम आते हैं जत्रोफा की जडें जमीन से फास्फोरस सोखने का कार्य करती हैं - इसका यह गुण अम्लीय भूमि के लिये वरदान है अपने पूरे जीवन के दौरान जमीन पर पत्तियां गिराता है जो भूमि की उर्वरा-शक्ति को बढाती हैं इसके बीजों से तेल निकालने के बाद जो खली बचती है वह उच्च कोटि की जैविक खाद है (नाइट्रोजन से भरपूर) । इसे जानवरों को भी खिलाया जा सकता है क्योकि यह प्रोटीन से भरपूर होती है। ग्लीसरीन भी इसका एक सह-उत्पाद है। जानवर और कीडे इससे प्राकृतिक रूप से ही दूर भागते हैं। इसलिये इसका उपयोग बागों और खेतों की रक्षा के लिये चारदीवारी के रूप में भी किया जाता है। इसके बीजों को पीसने पर जो तेल प्राप्त होता है उससे - वाहनों के लिये बायोडिजल बनाया जा सकता है सीधे लालटेन में डालकर जलाया जा सकता है इसे जलाकर भोजन पकाने के काम में लिया जा सकता है इसके तेल के अन्य उपयोग हैं - जलवायु संरक्षण, वार्निश, साबुन, जैव कीट-नाशक आदि औषधीय उपयोग इसके फूल और तने औषधीय गुणों के लिये जाने जाते हैं। इसकी पत्तियां घाव पर लपेटने (ड्रेसिंग) के काम आती हैं। इसके अलावा इससे चर्मरोगों की दवा, कैंसर, बाबासीर, ड्राप्सी, पक्षाघात, सर्पदंश, मच्छर भगाने की दवा तथा अन्य अनेक दवायें बनती हैं। इसके पौधे के अन्य उपयोग इसके छाल से गहरे नीले रंग की 'डाई' और मोम बनायी जा सकती है। इसकी जडों से पीले रंग की 'डाई' बनती है। इसका तना एक निम्न-श्रेणी की लकडी का भी काम करता है। इसे जलावनी लकडी के रूप में प्रयोग किया जाता है। जत्रोफा का सामाजिक महत्व जत्रोफा अक्षय उर्जा (sustainable energy) का एक प्रमुख साधन बन सकता है। भारत जैसे देशों की जीवाश्म इंधन पर निर्भरता समाप्त करके आत्मनिर्भर बना सकता है। इसकी खेती और उपयोग के लिये कोई तकनीक नही चाहिये; प्रसंस्करण की सारी की जरूरतें एक गांव में ही पूरी की जा सकती हैं। इसके विपरीत इसकी खेती श्रम-प्रधान होने के कारण भारत जैसे अधिक जनसंख्या वाले देशों के लिये बहुत उपयुक्त है। इसकी खेती से महिलाओं, बृद्धों, बच्चों, गरीब और अशिक्षित जनता को भारी मात्रा में रोजगार मिलेगा जिससे गरीबी उन्मूलन में मदद मिलेगी। इससे कृषि परा आधारित उद्योगों को बढावा मिलेगा। जत्रोफा और पर्यावरण एक तरफ जहां जत्रोफा को एक वरदान की तरह माना जा रहा है, कुछ लोग बडे पैमाने पर इसकी खेती का विरोध भी कर रहे हैं। भारत में जत्रोफा भारत में केन्द्र सरकार और लगभग सभी राज्य सरकारें रतनजोत की खेती के लिये प्र्त्साहन दे रहीं है। जहां तक भारत में जैट्रोफा की खेती का प्रश्न है, जो उसके लिए पर्याप्त आकार से ऐसी भूमि उपलब्ध है जिस पर खेती नहीं की जाती। ऐसी परती भूमि को अंट्रोफा खेती के अन्तर्गत लाकर कृषकों की अतिरिक्त आय के अवसर प्रदान किये जा सकते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य में रतनजोत से तेल निकालने की प्रायोगिक योजना पर अच्छा काम हुआ है। मध्यप्रदेश में भी इस बारे में विचार चल रहा है। कुछ समय पूर्व सरकार ने चंबल के बीहड़ों में रतनजोत के बीजों के हवाई छिड़काव की योजना पर विचार किया है। वैसे भी मध्यप्रदेश से यत्र-तत्र-सर्वत्र बंजर और अनुपयुक्त भूमि में सहज रूप से रतनजोत पैदा हो रही है जिसे अनदेखा किया जा रहा है। मध्यप्रदेश में लाखों एकड़ में उजाड़ और आर्थिक रूप से अलाभकारी वनभूमि व्यर्थ पड़ी हुई है। यदि सरकार वनवासियों और आदिवासियों को इस भूमि पर रतनजोत उगाने की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराये तो इसके लाभकारी परिणाम मिल सकते हैं। मध्यप्रदेश में तो प्राकृतिक रूप से ही रतनजोत का विशाल भंडार मौजूद है। इसके दोहन से न केवल मध्य- प्रदेश सम्पन्न होगा वरन कई हाथों को काम मिलेगा। बाह्य सूत्र रतनजोत का अंधविरोध क्यों? रतनजोत के पीछे अंधी दौड़ क्यों? बायो-डीज़ल से दौड़ रही हैं गाड़ियाँ रतनजोत : पड़त भूमि के लिए वरदान निकलने लगा रतनजोत से डीजल The Jatropha System - An Integrated Approach of Rural Development in Tropical & Subtropical Countries CENTRE FOR JATROPHA PROMOTION - Promoting Farming For Future Fuel Centre for Jatropha Promotion & Biodiesel - Promoting Farming For Future Fuel Jatropha incentives in India

कुक्कुट पालन

ग्रामीण क्षेत्रों में मुर्गी पालन ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे स्तर पर मुर्गी पालन से अतिरिक्त आय प्राप्त होती है साथ ही मुर्गी का मल (विष्ठा) का उपयोग बटन मशरूम उत्पादन हेतु कम्पोस्ट बनाने तथा खाद के रूप में खेतो में प्रयोग से फसल की उत्पादकता में बढ़ोत्तरी होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में केंद्रीय पक्षी अनुसन्धान संस्थान, इज्ज़तनगर बरेली से विकसित उन्नत प्रजाति श्यामा, निर्भीक , उपकारी, तथा हितकारी का प्रयोग करें। इसके पालन में आने वाले व्यय की भरपाई पांचवे महीने में मुर्गा बेचकर हो जाती है। इसके उपरान्त मुर्गी से १२-१५ माह तक अंडा उत्पादन से अच्छी कमाई प्राप्त होती है। वर्मी कम्पोस्ट बनाते समय प्राप्त हुए अधिक केचुओं को मुर्गो हेतु खाने को देने से अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। इसी प्रकार एजोला का भी उपयोग मुर्गों द्वारा किया जाता है। करीब ४० मुर्गियों के विष्ठा से उतना ही पोषक तत्त्व प्राप्त होता है जितना कि एक गाय के गोबर से प्राप्त होता है। इन्हें भी देखें मधुमक्खी पालन मत्स्य पालन पशुपालन सूकर पालन बाहरी कड़ियाँ औषधीय पौधों से मुर्गीपालन में उपचार पारंपरिक पशु चिकित्सा पद्धतियाँ कुक्कुट पालन (उत्तरा कृषि प्रभा पर कुक्कुट पालन के सभी पहलुओं पर विस्तृत जानकारी) मुर्गी पालन (भारत विकास प्रवेशद्वार) मुर्गीपालन में रोजगार के अवसर (रोजगार समाचार) Raise your own Poultry A comprehensive guide to building Chicken coops and Caring for Chickens Chickens, Coops And Poultry Resource For Poultry Farming And Rearing Chickens. श्रेणियाँ: आधार कुक्कुट पालन उद्योग

शुष्क-भूमि कृषि

sushk bhumi krishi (Dryland farming) सिंचाई किये बिना ही कृषि करने की तकनीक है। यह उन क्षेत्रों के लिये उपयोगी है जहाँ बहुत कम वर्षा होती है। इसके अंतर्गत उपलब्ध सीमित नमी को संचित करके बिना सिंचाई के ही फसलें उगायी जाती हैं। वर्षा की कमी के कारण मिट्टी की नमी को बनाये रखने तथा उसे बढ़ाने का निरन्तर प्रयास किया जाता है। इसके लिए गहरी जुताई की जाती है और वाष्पीकरण को रोकने का प्रयत्न किया जाता है। इसके अंतर्गत अल्प नमी में तथा कम समय में उत्पन्न होने वाली फसलें उत्पन्न की जाती हैं। इस प्रकार की खेती विशेष रूप से भूमध्य सागरीय प्रदेशों तथा अमेरिका के कोलम्बिया पठार पर की जाती है। बाहरी कड़ियाँ शुष्क भूमि कृषि तकनीक झारखंड : शुष्क भूमि कृषि तकनीक बारानी कृषि शब्दावली (Dryland Agriculture Glossary

Friday, 23 August 2013

मधुमक्खी पालन

मधु, परागकण आदि की प्राप्ति के लिये मधुमक्खियाँ पाली जातीं हैं। यह एक क्रिषि आधारित उद्योग है। मधुमक्खियां फूलों के रस को शहद में बदल देती हैं और उन्हें अपने छत्तों में जमा करती हैं। जंगलों से मधु एकत्र करने की परंपरा लंबे समय से लुप्त हो रही है। बाजार में शहद और इसके उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण मधुमक्खी पालन अब एक लाभदायक और आकर्षक उद्यम के रूप में स्थापित हो चला है। मधुमक्खी पालन के उत्पाद के रूप में शहद और मोम आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
मधुमक्खी पालन के लाभ[संपादित करें]

पुष्परस व पराग का सदुपयोग, आय व स्वरोजगार का सृजन |
शुद्व मधु, रायल जेली उत्पादन, मोम उत्पादन, पराग, मौनी विष आदि |
३ बगैर अतिरिक्त खाद, बीज, सिंचाई एवं शस्य प्रबन्ध के मात्र मधुमक्खी के मौन वंश को फसलों के खेतों व मेड़ों पर रखने से कामेरी मधुमक्खी के पर परागण प्रकिया से फसल, सब्जी एवं फलोद्यान में सवा से डेढ़ गुना उपज में बढ़ोत्तरी होती है |
मधुमक्खी उत्पाद जैसे मधु, रायलजेली व पराग के सेवन से मानव स्वस्थ एवं निरोगित होता है | मधु का नियमित सेवन करने से तपेदिक, अस्थमा, कब्जियत, खूल की कमी, रक्तचाप की बीमारी नहीं होती है | रायल जेली का सेवन करने से ट्यूमर नहीं होता है और स्मरण शक्ति व आयु में वृद्वि होती है | मधु मिश्रित पराग का सेवन करने से प्रास्ट्रेटाइटिस की बीमारी नहीं होती है | मौनी विष से गाठिया, बताश व कैंसर की दवायें बनायी जाती हैं | बी- थिरैपी से असाध्य रोगों का निदान किया जाता है |
मधुमक्खी पालन में कम समय, कम लागत और कम ढांचागत पूंजी निवेश की जरूरत होती है,
कम उपजवाले खेत से भी शहद और मधुमक्खी के मोम का उत्पादन किया जा सकता है,
मधुमक्खियां खेती के किसी अन्य उद्यम से कोई ढांचागत प्रतिस्पर्द्धा नहीं करती हैं,
मधुमक्खी पालन का पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मधुमक्खियां कई फूलवाले पौधों के परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस तरह वे सूर्यमुखी और विभिन्न फलों की उत्पादन मात्रा बढ़ाने में सहायक होती हैं,
शहद एक स्वादिष्ट और पोषक खाद्य पदार्थ है। शहद एकत्र करने के पारंपरिक तरीके में मधुमक्खियों के जंगली छत्ते नष्ट कर दिये जाते हैं। इसे मधुमक्खियों को बक्सों में रख कर और घर में शहद उत्पादन कर रोका जा सकता है,
मधुमक्खी पालन किसी एक व्यक्ति या समूह द्वारा शुरू किया जा सकता है,
बाजार में शहद और मोम की भारी मांग है।

दुग्ध कृषि

दुग्ध कृषि (Dairy farming) , या डेरी उद्योग या दुग्ध उद्योग, कृषि की एक श्रेणी है। यह पशुपालन से जुड़ा एक बहुत लोकप्रिय उद्यम है जिसके अंतर्गत दुग्ध उत्पादन, उसकी प्रोसेसिंग और खुदरा बिक्री के लिए किए जाने वाले कार्य आते हैं। इसके वास्ते गाय-भैंसों, बकरियों या कुछेक अन्य प्रकार के पशुधन के विकास का भी काम किया जाता है। अधिकतर डेरी-फार्म अपनी गायों के बछड़ों का, गैर-दुग्ध उत्पादक पशुधन का पालन पोषण करने की बजाए सामान्यतः उन्हें मांस के उत्पादन हेतु विक्रय कर देते हैं। डेरी फार्मिंग के अंतर्गत दूध देने वाले मवेशियों का प्रजनन तथा देखभाल, दूध की खरीद और इसकी विभिन्न डेरी उत्पादों के रूप में प्रोसेसिंग आदि कार्य सम्मिलित हैं।
अनुक्रम  [छुपाएँ]
1 विश्व में दुग्ध उत्पादन
2 भारत का दुग्ध उद्योग
3 बाहरी कड़ियाँ
4 सन्दर्भ
विश्व में दुग्ध उत्पादन[संपादित करें]

विश्व में दुग्ध उत्पादन
स्थान (Rank) देश उत्पादन (109kg/y)[1]
1 Flag of India.svg India 114.4
2 Flag of the United States.svg United States 79.3
3 Flag of Pakistan.svg Pakistan 35.2
4 Flag of the People's Republic of China.svg China 32.5
5 Flag of Germany.svg Germany 28.5
6 Flag of Russia.svg Russia 28.5
7 Flag of Brazil.svg Brazil 26.2
8 Flag of France.svg France 24.2
9 Flag of New Zealand.svg New Zealand 17.3
10 Flag of the United Kingdom.svg United Kingdom 13.9
11 Flag of Ukraine.svg Ukraine 12.2
12 Flag of Poland.svg Poland 12
13 Flag of the Netherlands.svg Netherlands 11.5
14 Flag of Italy.svg Italy 11.0
15 Flag of Turkey.svg Turkey 10.6
16 Flag of Mexico.svg Mexico 10.2
17 Flag of Australia.svg Australia 9.6
18 Flag of Egypt.svg Egypt 8.7
19 Flag of Argentina.svg Argentina 8.5
20 Flag of Canada.svg Canada 8.1
भारत का दुग्ध उद्योग[संपादित करें]

भारत गांवों में बसता है। हमारी ७२ प्रतिशत से अधिक जनसंख्या ग्रामीण है तथा ६० प्रतिशत लोग कृषि व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। करीब ७ करोड़ कृषक परिवार में प्रत्येक दो ग्रामीण घरों में से एक डेरी उद्योग से जुड़े हैं। भारतीय दुग्ध उत्पादन से जुड़े महत्वपूर्ण सांख्यिकी आंकड़ों के अनुसार देश में ७० प्रतिशत दूध की आपूर्ति छोटे/ सीमांत/ भूमिहीन किसानों से होती है। भारत में कृषि भूमि की अपेक्षा गायों का ज्यादा समानता पूर्वक वितरण है। भारत की ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था को सुदृढ़ करने में डेरी-उद्योग की प्रमुख भूमिका है।
देश में सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में इसे मान्यता दी गई है। कृषि और डेरी-फार्मिंग के बीच एक परस्पर निर्भरता वाला संबंध है। कृषि उत्पादों से मवेशियों के लिए भोजन और चारा उपलब्ध होता है जबकि मवेशी पोषण सुरक्षा माल उपलब्ध कराने के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के दुग्ध उत्पादों दूध, घी, मक्खन, पनीर, संघनित दूध, दूध का पाउडर, दही आदि का उत्पादन करता है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारत का अपना विशेष स्थान है और यह विश्व में सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक और दुग्ध उत्पादों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। संयोग से भारत विश्व में सबसे कम खर्च पर यानी २७ सेंट प्रति लीटर की दर से दूध का उत्पादन करता है ( अमरीका में ६३ सेंट और जापान में २.८)। यदि वर्तमान रूझान जारी रहता है तो मिनरल वाटर उद्योग की तरह दुग्ध प्रोसेसिंग उद्योग में भी बहुत तेजी से विकास होने की पर्याप्त संभावनाएं हैं। अगले १० वर्षों में तिगुनी वृद्धि के साथ भारत विश्व में दुग्ध उत्पादों को तैयार करने वाला अग्रणी देश बन जाएगा।
रोजगार की संभावनाएं इस उद्योग के तहत सरकारी और गैर- सरकारी दोनों ही क्षेत्रों में रोजगार के अवसर मौजूद हैं। राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) विभिन्न स्थानों पर स्थित इस क्षेत्र का प्रमुख सार्वजनिक प्रतिष्ठान है, जो कि किसानों के नेतृत्व वाले व्यावसायिक कृषि संबंधी कार्यों में संलग्न है। देश में अब ४०० से अधिक डेरी संयंत्र हैं जहाँ विभिन्न प्रकार के दुग्ध उत्पाद तैयार किए जाते हैं। उन्हें संयंत्रों के दक्षतापूर्ण संचालन के वास्ते सुयोग्य और सुप्रशिक्षित कार्मिकों की आवश्यकता होती है।

जैविक खेती

जैविक खेती (Organic farming) कृषि की वह विधि है जो संश्लेषित उर्वरकों एवं संश्लेषित कीटनाशकों के अप्रयोग या न्यूनतम प्रयोग पर आधारित है तथा जो भूमि की उर्वरा शक्ति को बचाये रखने के लिये फसल चक्र, हरी खाद, कम्पोस्ट आदि का प्रयोग करती है। सन् १९९० के बाद से विश्व में जैविक उत्पादों का बाजार काफ बढ़ा है।
अनुक्रम

    1 परिचय
    2 जैविक खेती से होने वाले लाभ
        2.1 कृषकों की दृष्टि से लाभ
        2.2 मिट्टी की दृष्टि से
        2.3 पर्यावरण की दृष्टि से
    3 जैविक खेती हेतु प्रमुख जैविक खाद एवं दवाईयाँ
        3.1 जैविक खादें
        3.2 जैविक खाद तैयार करने के कृषकों के अन्य अनुभव
        3.3 जैविक पद्धति द्वारा व्याधि नियंत्रण के कृषकों के अनुभव
    4 बाहरी कड़ियाँ

परिचय

संपूर्ण विश्व में बढ़ती हुई जनसंख्या एक गंभीर समस्या है, बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा खाद्य उत्पादन की होड़ में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए तरह-तरह की रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों का उपयोग, प्रकृति के जैविक और अजैविक पदाथाæ के बीच आदान-प्रदान के चक्र को (इकालाजी सिस्टम) प्रभावित करता है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति खराब हो जाती है, साथ ही वातावरण प्रदूषित होता है तथा मनुष्य के स्वास्थ्य में गिरावट आती है।

प्राचीन काल में मानव स्वास्थ्य के अनुकुल तथा प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप खेती की जाती थी, जिससे जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान का चक्र निरन्तर चलता रहा था, जिसके फलस्वरूप जल, भूमि, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता था। भारत वर्ष में प्राचीन काल से कृषि के साथ-साथ गौ पालन किया जाता था, जिसके प्रमाण हमारे ग्रांथों में प्रभु कृष्ण और बलराम हैं जिन्हें हम गोपाल एवं हलधर के नाम से संबोधित करते हैं अर्थात कृषि एवं गोपालन संयुक्त रूप से अत्याधिक लाभदायी था, जोकि प्राणी मात्र व वातावरण के लिए अत्यन्त उपयोगी था। परन्तु बदलते परिवेश में गोपालन धीरे-धीरे कम हो गया तथा कृषि में तरह-तरह की रसायनिक खादों व कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है जिसके फलस्वरूप जैविक और अजैविक पदाथाæ के चक्र का संतुलन बिगड़ता जा रहा है, और वातावरण प्रदूषित होकर, मानव जाति के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। अब हम रसायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों के उपयोग के स्थान पर, जैविक खादों एवं दवाईयों का उपयोग कर, अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं जिससे भूमि, जल एवं वातावरण शुद्ध रहेगा और मनुष्य एवं प्रत्येक जीवधारी स्वस्थ रहेंगे।

भारत वर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और कृषकों की मुख्य आय का साधन खेती है। हरित क्रांति के समय से बढ़ती हुई जनसंख्या को देखते हुए एवं आय की दृष्टि से उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है अधिक उत्पादन के लिये खेती में अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरको एवं कीटनाशक का उपयोग करना पड़ता है जिससे सीमान्य व छोटे कृषक के पास कम जोत में अत्यधिक लागत लग रही है और जल, भूमि, वायु और वातावरण भी प्रदूषित हो रहा है साथ ही खाद्य पदार्थ भी जहरीले हो रहे है। इसलिए इस प्रकार की उपरोक्त सभी समस्याओं से निपटने के लिये गत वर्षों से निरन्तर टिकाऊ खेती के सिद्धान्त पर खेती करने की सिफारिश की गई, जिसे प्रदेश के कृषि विभाग ने इस विशेष प्रकार की खेती को अपनाने के लिए, बढ़ावा दिया जिसे हम जैविक खेती के नाम से जानते है। भारत सरकार भी इस खेती को अपनाने के लिए प्रचार-प्रसार कर रही है।

म.प्र. में सर्वप्रथम 2001-02 में जैविक खेती का अन्दोलन चलाकर प्रत्येक जिले के प्रत्येक विकास खण्ड के एक गांव मे जैविक खेती प्रारम्भ कि गई और इन गांवों को जैविक गांव का नाम दिया गया । इस प्रकार प्रथम वर्ष में कुल 313 ग्रामों में जैविक खेती की शुरूआत हुई। इसके बाद 2002-03 में दि्वतीय वर्ष मे प्रत्येक जिले के प्रत्येक विकासखण्ड के दो-दो गांव, वर्ष 2003-04 में 2-2 गांव अर्थात 1565 ग्रामों मे जैविक खेती की गई। वर्ष 2006-07 में पुन: प्रत्येक विकासखण्ड में 5-5 गांव चयन किये गये। इस प्रकार प्रदेश के 3130 ग्रामों जैविक खेती का कार्यक्रम लिया जा रहा है। मई 2002 में राष्ट्रीय स्तर का कृषि विभाग के तत्वाधान में भोपाल में जैविक खेती पर सेमीनार आयोजित किया गया जिसमें राष्ट्रीय विशेषज्ञों एवं जैविक खेती करने वाले अनुभवी कृषकों द्वारा भाग लिया गया जिसमें जैविक खेती अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया गया। प्रदेश के प्रत्येक जिले में जैविक खेती के प्रचार-प्रसार हेतु चलित झांकी, पोस्टर्स, बेनर्स, साहित्य, एकल नाटक, कठपुतली प्रदशÇन जैविक हाट एवं विशेषज्ञों द्वारा जैविक खेती पर उद्बोधन आदि के माध्यम से प्रचार-प्रसार किया जाकर कृषकों में जन जाग्रति फैलाई जा रही है।
जैविक खेती से होने वाले लाभ
कृषकों की दृष्टि से लाभ

    भूमि की उपजाऊ क्षमता में वृद्धि हो जाती है।
    सिंचाई अंतराल में वृद्धि होती है ।
    रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने से लागत में कमी आती है।
    फसलों की उत्पादकता में वृद्धि।

मिट्टी की दृष्टि से

    जैविक खाद के उपयोग करने से भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है।
    भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ती हैं।
    भूमि से पानी का वाष्पीकरण कम होगा।

पर्यावरण की दृष्टि से

    भूमि के जल स्तर में वृद्धि होती है।
    मिट्टी, खाद्य पदार्थ और जमीन में पानी के माध्यम से होने वाले प्रदूषण मे कमी आती है।
    कचरे का उपयोग, खाद बनाने में, होने से बीमारियों में कमी आती है ।
    फसल उत्पादन की लागत में कमी एवं आय में वृद्धि
    अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पाद की गुणवत्ता का खरा उतरना।

जैविक खेती, की विधि रासायनिक खेती की विधि की तुलना में बराबर या अधिक उत्पादन देती है अर्थात जैविक खेती मृदा की उर्वरता एवं कृषकों की उत्पादकता बढ़ाने में पूर्णत: सहायक है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में जैविक खेती की विधि और भी अधिक लाभदायक है । जैविक विधि द्वारा खेती करने से उत्पादन की लागत तो कम होती ही है इसके साथ ही कृषक भाइयों को आय अधिक प्राप्त होती है तथा अंतराष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पाद अधिक खरे उतरते हैं। जिसके फलस्वरूप सामान्य उत्पादन की अपेक्षा में कृषक भाई अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। आधुनिक समय में निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या, पर्यावरण प्रदूषण, भूमि की उर्वरा शकि्त का संरक्षण एवं मानव स्वास्थ्य के लिए जैविक खेती की राह अत्यन्त लाभदायक है । मानव जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए नितान्त आवश्यक है कि प्राकृतिक संसाधन प्रदूषित न हों, शुद्ध वातावरण रहे एवं पौषि्टक आहार मिलता रहे, इसके लिये हमें जैविक खेती की कृषि पद्धतियाँ को अपनाना होगा जोकि हमारे नैसर्गिक संसाधनों एवं मानवीय पर्यावरण को प्रदूषित किये बगैर समस्त जनमानस को खाद्य सामग्री उपलब्ध करा सकेगी तथा हमें खुशहाल जीने की राह दिखा सकेगी।