Sunday, 25 August 2013

जत्रोफा

जत्रोफा लगभग १७५ प्रजाति की वनस्पतियों का समूह है जिसमें झाडियां और पौधे सम्मिलित हैं। इसके पौधे भारत, अफ्रिका, उत्तरी अमेरिका, और कैरेबियन् जैसे ट्रापिकल क्षेत्रों में उत्पन्न होते हैं। यह एक बड़ा पादप है जो झाड़ियों के रूप में अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों में उगता है। इस पादप से प्राप्त होने वाले बीजों में 25-30 प्रतिशत तक तेल निकाला जा सकता है। इस तेल से कार आदि चलाये जा सकते हैं तथा जो अवशेष बचता है उससे बिजली पैदा की जा सकती है। जत्रोफा अनावृष्टि-रोधी सदाबहार झाडी है। यह कठिन परिस्थितियओं को भी झेलने में सक्षम है। अन्य नाम : रतनजोत, जंगली एरंडी, बंगरेड़ - हिन्दी कतमनक (Katamanak) - मलयालम कट्टमनक्कु (Kattamanakku) - तमिल पेपलम् (Pepalam) - तेलुगू कडहरलु (Kadaharalu) - कन्नड़ जेपाल (Jepal) - गुजराती भाषा कानन रण्ड - संस्कृत भाषा अनुक्रम 1 जत्रोफा की विशेषताएं 2 जत्रोफा के उपयोग 3 जत्रोफा का सामाजिक महत्व 4 जत्रोफा और पर्यावरण 5 भारत में जत्रोफा 6 बाह्य सूत्र जत्रोफा की विशेषताएं इसके बीज सस्ते हैं बीजों में तेल की मात्रा बहुत अधिक है (लगभग ३७%) इससे प्राप्त तेल का ज्वलन ताप (फ्लैश प्वाइंट) अधिक होने के कारण यह बहुत सुरक्षित भी है। १.०५ किग्रा जत्रोफा तेल से १ किग्रा बायोडिजल पैदा होता है। जत्रोफा का तेल बिना रिफाइन किये हुए भी इंधन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। जत्रोफा का तेल जलाने पर धुआंरहित स्वच्छ लौ पैदा करता है। थोडे ही दिनों (लगभग दो वर्ष) में इसके पौधे से फल प्राप्त होने लगते हैं उपजाऊ भूमि और खराब (उसर भूमि) भूमि, दोनो पर इसकी उपज ली जा सकती है कम वर्षा के क्षेत्रों (२०० मिमी) और अधिक वर्षा के क्षेत्रों, दोनों में यह जीवित रहता और फलता-फूलता है वहां भी इसकी पैदावार ली जा सकती है जहां दूसरी फसलें नही ली जा सकतीं। इसे नहरों के किनारे, सडकों के किनारे या रेलवे लाइन के किनारे भी लगा सकते हैं। यह कठिन परिस्थितियों को भी सह लेता है। इसकी खेती के लिये किसी प्रकार की विशेषज्ञता की आवश्यकता नहीं होती। इसके पौधे की उंचाई भी फल और बीज इकट्ठा करने की दृष्टि से बहुत उपयुक्त है - जमीन पर खडे होकर ही फल तोडे जा सकते हैं। फल वर्षा ऋतु आरम्भ होने के पाले ही पक जाते हैं, इसलिये भी फल इकट्ठा करना आसान काम है। इसके पौधा लगभग ५० वर्ष तक फल पैदा करता है। बार-बार फसल लगाने की आवश्यकता नहीं होती। इसको लगाना आसान है, यह तेजी से बढता है, और इसको देखरेख की बहुत कम जरूरत होती है। इसको जानवर नही खाते और कीट नही लगते। इस कारण इसकी विशेष देखभाल नहीं करनी पडती। यह् किसी भी पसल का प्रतिस्पर्धी नहीं है, बल्कि यह उन फसलों की पैदावार बढाने में मदद करता है। जत्रोफा के उपयोग जत्रोफा के करीब १६०० उपयोग गिनाये गये हैं। इसके पौधे भू-क्षरण रोकने के लिये भी काम आते हैं जत्रोफा की जडें जमीन से फास्फोरस सोखने का कार्य करती हैं - इसका यह गुण अम्लीय भूमि के लिये वरदान है अपने पूरे जीवन के दौरान जमीन पर पत्तियां गिराता है जो भूमि की उर्वरा-शक्ति को बढाती हैं इसके बीजों से तेल निकालने के बाद जो खली बचती है वह उच्च कोटि की जैविक खाद है (नाइट्रोजन से भरपूर) । इसे जानवरों को भी खिलाया जा सकता है क्योकि यह प्रोटीन से भरपूर होती है। ग्लीसरीन भी इसका एक सह-उत्पाद है। जानवर और कीडे इससे प्राकृतिक रूप से ही दूर भागते हैं। इसलिये इसका उपयोग बागों और खेतों की रक्षा के लिये चारदीवारी के रूप में भी किया जाता है। इसके बीजों को पीसने पर जो तेल प्राप्त होता है उससे - वाहनों के लिये बायोडिजल बनाया जा सकता है सीधे लालटेन में डालकर जलाया जा सकता है इसे जलाकर भोजन पकाने के काम में लिया जा सकता है इसके तेल के अन्य उपयोग हैं - जलवायु संरक्षण, वार्निश, साबुन, जैव कीट-नाशक आदि औषधीय उपयोग इसके फूल और तने औषधीय गुणों के लिये जाने जाते हैं। इसकी पत्तियां घाव पर लपेटने (ड्रेसिंग) के काम आती हैं। इसके अलावा इससे चर्मरोगों की दवा, कैंसर, बाबासीर, ड्राप्सी, पक्षाघात, सर्पदंश, मच्छर भगाने की दवा तथा अन्य अनेक दवायें बनती हैं। इसके पौधे के अन्य उपयोग इसके छाल से गहरे नीले रंग की 'डाई' और मोम बनायी जा सकती है। इसकी जडों से पीले रंग की 'डाई' बनती है। इसका तना एक निम्न-श्रेणी की लकडी का भी काम करता है। इसे जलावनी लकडी के रूप में प्रयोग किया जाता है। जत्रोफा का सामाजिक महत्व जत्रोफा अक्षय उर्जा (sustainable energy) का एक प्रमुख साधन बन सकता है। भारत जैसे देशों की जीवाश्म इंधन पर निर्भरता समाप्त करके आत्मनिर्भर बना सकता है। इसकी खेती और उपयोग के लिये कोई तकनीक नही चाहिये; प्रसंस्करण की सारी की जरूरतें एक गांव में ही पूरी की जा सकती हैं। इसके विपरीत इसकी खेती श्रम-प्रधान होने के कारण भारत जैसे अधिक जनसंख्या वाले देशों के लिये बहुत उपयुक्त है। इसकी खेती से महिलाओं, बृद्धों, बच्चों, गरीब और अशिक्षित जनता को भारी मात्रा में रोजगार मिलेगा जिससे गरीबी उन्मूलन में मदद मिलेगी। इससे कृषि परा आधारित उद्योगों को बढावा मिलेगा। जत्रोफा और पर्यावरण एक तरफ जहां जत्रोफा को एक वरदान की तरह माना जा रहा है, कुछ लोग बडे पैमाने पर इसकी खेती का विरोध भी कर रहे हैं। भारत में जत्रोफा भारत में केन्द्र सरकार और लगभग सभी राज्य सरकारें रतनजोत की खेती के लिये प्र्त्साहन दे रहीं है। जहां तक भारत में जैट्रोफा की खेती का प्रश्न है, जो उसके लिए पर्याप्त आकार से ऐसी भूमि उपलब्ध है जिस पर खेती नहीं की जाती। ऐसी परती भूमि को अंट्रोफा खेती के अन्तर्गत लाकर कृषकों की अतिरिक्त आय के अवसर प्रदान किये जा सकते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य में रतनजोत से तेल निकालने की प्रायोगिक योजना पर अच्छा काम हुआ है। मध्यप्रदेश में भी इस बारे में विचार चल रहा है। कुछ समय पूर्व सरकार ने चंबल के बीहड़ों में रतनजोत के बीजों के हवाई छिड़काव की योजना पर विचार किया है। वैसे भी मध्यप्रदेश से यत्र-तत्र-सर्वत्र बंजर और अनुपयुक्त भूमि में सहज रूप से रतनजोत पैदा हो रही है जिसे अनदेखा किया जा रहा है। मध्यप्रदेश में लाखों एकड़ में उजाड़ और आर्थिक रूप से अलाभकारी वनभूमि व्यर्थ पड़ी हुई है। यदि सरकार वनवासियों और आदिवासियों को इस भूमि पर रतनजोत उगाने की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराये तो इसके लाभकारी परिणाम मिल सकते हैं। मध्यप्रदेश में तो प्राकृतिक रूप से ही रतनजोत का विशाल भंडार मौजूद है। इसके दोहन से न केवल मध्य- प्रदेश सम्पन्न होगा वरन कई हाथों को काम मिलेगा। बाह्य सूत्र रतनजोत का अंधविरोध क्यों? रतनजोत के पीछे अंधी दौड़ क्यों? बायो-डीज़ल से दौड़ रही हैं गाड़ियाँ रतनजोत : पड़त भूमि के लिए वरदान निकलने लगा रतनजोत से डीजल The Jatropha System - An Integrated Approach of Rural Development in Tropical & Subtropical Countries CENTRE FOR JATROPHA PROMOTION - Promoting Farming For Future Fuel Centre for Jatropha Promotion & Biodiesel - Promoting Farming For Future Fuel Jatropha incentives in India

कुक्कुट पालन

ग्रामीण क्षेत्रों में मुर्गी पालन ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे स्तर पर मुर्गी पालन से अतिरिक्त आय प्राप्त होती है साथ ही मुर्गी का मल (विष्ठा) का उपयोग बटन मशरूम उत्पादन हेतु कम्पोस्ट बनाने तथा खाद के रूप में खेतो में प्रयोग से फसल की उत्पादकता में बढ़ोत्तरी होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में केंद्रीय पक्षी अनुसन्धान संस्थान, इज्ज़तनगर बरेली से विकसित उन्नत प्रजाति श्यामा, निर्भीक , उपकारी, तथा हितकारी का प्रयोग करें। इसके पालन में आने वाले व्यय की भरपाई पांचवे महीने में मुर्गा बेचकर हो जाती है। इसके उपरान्त मुर्गी से १२-१५ माह तक अंडा उत्पादन से अच्छी कमाई प्राप्त होती है। वर्मी कम्पोस्ट बनाते समय प्राप्त हुए अधिक केचुओं को मुर्गो हेतु खाने को देने से अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। इसी प्रकार एजोला का भी उपयोग मुर्गों द्वारा किया जाता है। करीब ४० मुर्गियों के विष्ठा से उतना ही पोषक तत्त्व प्राप्त होता है जितना कि एक गाय के गोबर से प्राप्त होता है। इन्हें भी देखें मधुमक्खी पालन मत्स्य पालन पशुपालन सूकर पालन बाहरी कड़ियाँ औषधीय पौधों से मुर्गीपालन में उपचार पारंपरिक पशु चिकित्सा पद्धतियाँ कुक्कुट पालन (उत्तरा कृषि प्रभा पर कुक्कुट पालन के सभी पहलुओं पर विस्तृत जानकारी) मुर्गी पालन (भारत विकास प्रवेशद्वार) मुर्गीपालन में रोजगार के अवसर (रोजगार समाचार) Raise your own Poultry A comprehensive guide to building Chicken coops and Caring for Chickens Chickens, Coops And Poultry Resource For Poultry Farming And Rearing Chickens. श्रेणियाँ: आधार कुक्कुट पालन उद्योग

शुष्क-भूमि कृषि

sushk bhumi krishi (Dryland farming) सिंचाई किये बिना ही कृषि करने की तकनीक है। यह उन क्षेत्रों के लिये उपयोगी है जहाँ बहुत कम वर्षा होती है। इसके अंतर्गत उपलब्ध सीमित नमी को संचित करके बिना सिंचाई के ही फसलें उगायी जाती हैं। वर्षा की कमी के कारण मिट्टी की नमी को बनाये रखने तथा उसे बढ़ाने का निरन्तर प्रयास किया जाता है। इसके लिए गहरी जुताई की जाती है और वाष्पीकरण को रोकने का प्रयत्न किया जाता है। इसके अंतर्गत अल्प नमी में तथा कम समय में उत्पन्न होने वाली फसलें उत्पन्न की जाती हैं। इस प्रकार की खेती विशेष रूप से भूमध्य सागरीय प्रदेशों तथा अमेरिका के कोलम्बिया पठार पर की जाती है। बाहरी कड़ियाँ शुष्क भूमि कृषि तकनीक झारखंड : शुष्क भूमि कृषि तकनीक बारानी कृषि शब्दावली (Dryland Agriculture Glossary

Friday, 23 August 2013

मधुमक्खी पालन

मधु, परागकण आदि की प्राप्ति के लिये मधुमक्खियाँ पाली जातीं हैं। यह एक क्रिषि आधारित उद्योग है। मधुमक्खियां फूलों के रस को शहद में बदल देती हैं और उन्हें अपने छत्तों में जमा करती हैं। जंगलों से मधु एकत्र करने की परंपरा लंबे समय से लुप्त हो रही है। बाजार में शहद और इसके उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण मधुमक्खी पालन अब एक लाभदायक और आकर्षक उद्यम के रूप में स्थापित हो चला है। मधुमक्खी पालन के उत्पाद के रूप में शहद और मोम आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
मधुमक्खी पालन के लाभ[संपादित करें]

पुष्परस व पराग का सदुपयोग, आय व स्वरोजगार का सृजन |
शुद्व मधु, रायल जेली उत्पादन, मोम उत्पादन, पराग, मौनी विष आदि |
३ बगैर अतिरिक्त खाद, बीज, सिंचाई एवं शस्य प्रबन्ध के मात्र मधुमक्खी के मौन वंश को फसलों के खेतों व मेड़ों पर रखने से कामेरी मधुमक्खी के पर परागण प्रकिया से फसल, सब्जी एवं फलोद्यान में सवा से डेढ़ गुना उपज में बढ़ोत्तरी होती है |
मधुमक्खी उत्पाद जैसे मधु, रायलजेली व पराग के सेवन से मानव स्वस्थ एवं निरोगित होता है | मधु का नियमित सेवन करने से तपेदिक, अस्थमा, कब्जियत, खूल की कमी, रक्तचाप की बीमारी नहीं होती है | रायल जेली का सेवन करने से ट्यूमर नहीं होता है और स्मरण शक्ति व आयु में वृद्वि होती है | मधु मिश्रित पराग का सेवन करने से प्रास्ट्रेटाइटिस की बीमारी नहीं होती है | मौनी विष से गाठिया, बताश व कैंसर की दवायें बनायी जाती हैं | बी- थिरैपी से असाध्य रोगों का निदान किया जाता है |
मधुमक्खी पालन में कम समय, कम लागत और कम ढांचागत पूंजी निवेश की जरूरत होती है,
कम उपजवाले खेत से भी शहद और मधुमक्खी के मोम का उत्पादन किया जा सकता है,
मधुमक्खियां खेती के किसी अन्य उद्यम से कोई ढांचागत प्रतिस्पर्द्धा नहीं करती हैं,
मधुमक्खी पालन का पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मधुमक्खियां कई फूलवाले पौधों के परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस तरह वे सूर्यमुखी और विभिन्न फलों की उत्पादन मात्रा बढ़ाने में सहायक होती हैं,
शहद एक स्वादिष्ट और पोषक खाद्य पदार्थ है। शहद एकत्र करने के पारंपरिक तरीके में मधुमक्खियों के जंगली छत्ते नष्ट कर दिये जाते हैं। इसे मधुमक्खियों को बक्सों में रख कर और घर में शहद उत्पादन कर रोका जा सकता है,
मधुमक्खी पालन किसी एक व्यक्ति या समूह द्वारा शुरू किया जा सकता है,
बाजार में शहद और मोम की भारी मांग है।

दुग्ध कृषि

दुग्ध कृषि (Dairy farming) , या डेरी उद्योग या दुग्ध उद्योग, कृषि की एक श्रेणी है। यह पशुपालन से जुड़ा एक बहुत लोकप्रिय उद्यम है जिसके अंतर्गत दुग्ध उत्पादन, उसकी प्रोसेसिंग और खुदरा बिक्री के लिए किए जाने वाले कार्य आते हैं। इसके वास्ते गाय-भैंसों, बकरियों या कुछेक अन्य प्रकार के पशुधन के विकास का भी काम किया जाता है। अधिकतर डेरी-फार्म अपनी गायों के बछड़ों का, गैर-दुग्ध उत्पादक पशुधन का पालन पोषण करने की बजाए सामान्यतः उन्हें मांस के उत्पादन हेतु विक्रय कर देते हैं। डेरी फार्मिंग के अंतर्गत दूध देने वाले मवेशियों का प्रजनन तथा देखभाल, दूध की खरीद और इसकी विभिन्न डेरी उत्पादों के रूप में प्रोसेसिंग आदि कार्य सम्मिलित हैं।
अनुक्रम  [छुपाएँ]
1 विश्व में दुग्ध उत्पादन
2 भारत का दुग्ध उद्योग
3 बाहरी कड़ियाँ
4 सन्दर्भ
विश्व में दुग्ध उत्पादन[संपादित करें]

विश्व में दुग्ध उत्पादन
स्थान (Rank) देश उत्पादन (109kg/y)[1]
1 Flag of India.svg India 114.4
2 Flag of the United States.svg United States 79.3
3 Flag of Pakistan.svg Pakistan 35.2
4 Flag of the People's Republic of China.svg China 32.5
5 Flag of Germany.svg Germany 28.5
6 Flag of Russia.svg Russia 28.5
7 Flag of Brazil.svg Brazil 26.2
8 Flag of France.svg France 24.2
9 Flag of New Zealand.svg New Zealand 17.3
10 Flag of the United Kingdom.svg United Kingdom 13.9
11 Flag of Ukraine.svg Ukraine 12.2
12 Flag of Poland.svg Poland 12
13 Flag of the Netherlands.svg Netherlands 11.5
14 Flag of Italy.svg Italy 11.0
15 Flag of Turkey.svg Turkey 10.6
16 Flag of Mexico.svg Mexico 10.2
17 Flag of Australia.svg Australia 9.6
18 Flag of Egypt.svg Egypt 8.7
19 Flag of Argentina.svg Argentina 8.5
20 Flag of Canada.svg Canada 8.1
भारत का दुग्ध उद्योग[संपादित करें]

भारत गांवों में बसता है। हमारी ७२ प्रतिशत से अधिक जनसंख्या ग्रामीण है तथा ६० प्रतिशत लोग कृषि व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। करीब ७ करोड़ कृषक परिवार में प्रत्येक दो ग्रामीण घरों में से एक डेरी उद्योग से जुड़े हैं। भारतीय दुग्ध उत्पादन से जुड़े महत्वपूर्ण सांख्यिकी आंकड़ों के अनुसार देश में ७० प्रतिशत दूध की आपूर्ति छोटे/ सीमांत/ भूमिहीन किसानों से होती है। भारत में कृषि भूमि की अपेक्षा गायों का ज्यादा समानता पूर्वक वितरण है। भारत की ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था को सुदृढ़ करने में डेरी-उद्योग की प्रमुख भूमिका है।
देश में सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में इसे मान्यता दी गई है। कृषि और डेरी-फार्मिंग के बीच एक परस्पर निर्भरता वाला संबंध है। कृषि उत्पादों से मवेशियों के लिए भोजन और चारा उपलब्ध होता है जबकि मवेशी पोषण सुरक्षा माल उपलब्ध कराने के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के दुग्ध उत्पादों दूध, घी, मक्खन, पनीर, संघनित दूध, दूध का पाउडर, दही आदि का उत्पादन करता है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारत का अपना विशेष स्थान है और यह विश्व में सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक और दुग्ध उत्पादों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। संयोग से भारत विश्व में सबसे कम खर्च पर यानी २७ सेंट प्रति लीटर की दर से दूध का उत्पादन करता है ( अमरीका में ६३ सेंट और जापान में २.८)। यदि वर्तमान रूझान जारी रहता है तो मिनरल वाटर उद्योग की तरह दुग्ध प्रोसेसिंग उद्योग में भी बहुत तेजी से विकास होने की पर्याप्त संभावनाएं हैं। अगले १० वर्षों में तिगुनी वृद्धि के साथ भारत विश्व में दुग्ध उत्पादों को तैयार करने वाला अग्रणी देश बन जाएगा।
रोजगार की संभावनाएं इस उद्योग के तहत सरकारी और गैर- सरकारी दोनों ही क्षेत्रों में रोजगार के अवसर मौजूद हैं। राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) विभिन्न स्थानों पर स्थित इस क्षेत्र का प्रमुख सार्वजनिक प्रतिष्ठान है, जो कि किसानों के नेतृत्व वाले व्यावसायिक कृषि संबंधी कार्यों में संलग्न है। देश में अब ४०० से अधिक डेरी संयंत्र हैं जहाँ विभिन्न प्रकार के दुग्ध उत्पाद तैयार किए जाते हैं। उन्हें संयंत्रों के दक्षतापूर्ण संचालन के वास्ते सुयोग्य और सुप्रशिक्षित कार्मिकों की आवश्यकता होती है।

जैविक खेती

जैविक खेती (Organic farming) कृषि की वह विधि है जो संश्लेषित उर्वरकों एवं संश्लेषित कीटनाशकों के अप्रयोग या न्यूनतम प्रयोग पर आधारित है तथा जो भूमि की उर्वरा शक्ति को बचाये रखने के लिये फसल चक्र, हरी खाद, कम्पोस्ट आदि का प्रयोग करती है। सन् १९९० के बाद से विश्व में जैविक उत्पादों का बाजार काफ बढ़ा है।
अनुक्रम

    1 परिचय
    2 जैविक खेती से होने वाले लाभ
        2.1 कृषकों की दृष्टि से लाभ
        2.2 मिट्टी की दृष्टि से
        2.3 पर्यावरण की दृष्टि से
    3 जैविक खेती हेतु प्रमुख जैविक खाद एवं दवाईयाँ
        3.1 जैविक खादें
        3.2 जैविक खाद तैयार करने के कृषकों के अन्य अनुभव
        3.3 जैविक पद्धति द्वारा व्याधि नियंत्रण के कृषकों के अनुभव
    4 बाहरी कड़ियाँ

परिचय

संपूर्ण विश्व में बढ़ती हुई जनसंख्या एक गंभीर समस्या है, बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा खाद्य उत्पादन की होड़ में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए तरह-तरह की रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों का उपयोग, प्रकृति के जैविक और अजैविक पदाथाæ के बीच आदान-प्रदान के चक्र को (इकालाजी सिस्टम) प्रभावित करता है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति खराब हो जाती है, साथ ही वातावरण प्रदूषित होता है तथा मनुष्य के स्वास्थ्य में गिरावट आती है।

प्राचीन काल में मानव स्वास्थ्य के अनुकुल तथा प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप खेती की जाती थी, जिससे जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान का चक्र निरन्तर चलता रहा था, जिसके फलस्वरूप जल, भूमि, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता था। भारत वर्ष में प्राचीन काल से कृषि के साथ-साथ गौ पालन किया जाता था, जिसके प्रमाण हमारे ग्रांथों में प्रभु कृष्ण और बलराम हैं जिन्हें हम गोपाल एवं हलधर के नाम से संबोधित करते हैं अर्थात कृषि एवं गोपालन संयुक्त रूप से अत्याधिक लाभदायी था, जोकि प्राणी मात्र व वातावरण के लिए अत्यन्त उपयोगी था। परन्तु बदलते परिवेश में गोपालन धीरे-धीरे कम हो गया तथा कृषि में तरह-तरह की रसायनिक खादों व कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है जिसके फलस्वरूप जैविक और अजैविक पदाथाæ के चक्र का संतुलन बिगड़ता जा रहा है, और वातावरण प्रदूषित होकर, मानव जाति के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। अब हम रसायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों के उपयोग के स्थान पर, जैविक खादों एवं दवाईयों का उपयोग कर, अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं जिससे भूमि, जल एवं वातावरण शुद्ध रहेगा और मनुष्य एवं प्रत्येक जीवधारी स्वस्थ रहेंगे।

भारत वर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और कृषकों की मुख्य आय का साधन खेती है। हरित क्रांति के समय से बढ़ती हुई जनसंख्या को देखते हुए एवं आय की दृष्टि से उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है अधिक उत्पादन के लिये खेती में अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरको एवं कीटनाशक का उपयोग करना पड़ता है जिससे सीमान्य व छोटे कृषक के पास कम जोत में अत्यधिक लागत लग रही है और जल, भूमि, वायु और वातावरण भी प्रदूषित हो रहा है साथ ही खाद्य पदार्थ भी जहरीले हो रहे है। इसलिए इस प्रकार की उपरोक्त सभी समस्याओं से निपटने के लिये गत वर्षों से निरन्तर टिकाऊ खेती के सिद्धान्त पर खेती करने की सिफारिश की गई, जिसे प्रदेश के कृषि विभाग ने इस विशेष प्रकार की खेती को अपनाने के लिए, बढ़ावा दिया जिसे हम जैविक खेती के नाम से जानते है। भारत सरकार भी इस खेती को अपनाने के लिए प्रचार-प्रसार कर रही है।

म.प्र. में सर्वप्रथम 2001-02 में जैविक खेती का अन्दोलन चलाकर प्रत्येक जिले के प्रत्येक विकास खण्ड के एक गांव मे जैविक खेती प्रारम्भ कि गई और इन गांवों को जैविक गांव का नाम दिया गया । इस प्रकार प्रथम वर्ष में कुल 313 ग्रामों में जैविक खेती की शुरूआत हुई। इसके बाद 2002-03 में दि्वतीय वर्ष मे प्रत्येक जिले के प्रत्येक विकासखण्ड के दो-दो गांव, वर्ष 2003-04 में 2-2 गांव अर्थात 1565 ग्रामों मे जैविक खेती की गई। वर्ष 2006-07 में पुन: प्रत्येक विकासखण्ड में 5-5 गांव चयन किये गये। इस प्रकार प्रदेश के 3130 ग्रामों जैविक खेती का कार्यक्रम लिया जा रहा है। मई 2002 में राष्ट्रीय स्तर का कृषि विभाग के तत्वाधान में भोपाल में जैविक खेती पर सेमीनार आयोजित किया गया जिसमें राष्ट्रीय विशेषज्ञों एवं जैविक खेती करने वाले अनुभवी कृषकों द्वारा भाग लिया गया जिसमें जैविक खेती अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया गया। प्रदेश के प्रत्येक जिले में जैविक खेती के प्रचार-प्रसार हेतु चलित झांकी, पोस्टर्स, बेनर्स, साहित्य, एकल नाटक, कठपुतली प्रदशÇन जैविक हाट एवं विशेषज्ञों द्वारा जैविक खेती पर उद्बोधन आदि के माध्यम से प्रचार-प्रसार किया जाकर कृषकों में जन जाग्रति फैलाई जा रही है।
जैविक खेती से होने वाले लाभ
कृषकों की दृष्टि से लाभ

    भूमि की उपजाऊ क्षमता में वृद्धि हो जाती है।
    सिंचाई अंतराल में वृद्धि होती है ।
    रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने से लागत में कमी आती है।
    फसलों की उत्पादकता में वृद्धि।

मिट्टी की दृष्टि से

    जैविक खाद के उपयोग करने से भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है।
    भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ती हैं।
    भूमि से पानी का वाष्पीकरण कम होगा।

पर्यावरण की दृष्टि से

    भूमि के जल स्तर में वृद्धि होती है।
    मिट्टी, खाद्य पदार्थ और जमीन में पानी के माध्यम से होने वाले प्रदूषण मे कमी आती है।
    कचरे का उपयोग, खाद बनाने में, होने से बीमारियों में कमी आती है ।
    फसल उत्पादन की लागत में कमी एवं आय में वृद्धि
    अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पाद की गुणवत्ता का खरा उतरना।

जैविक खेती, की विधि रासायनिक खेती की विधि की तुलना में बराबर या अधिक उत्पादन देती है अर्थात जैविक खेती मृदा की उर्वरता एवं कृषकों की उत्पादकता बढ़ाने में पूर्णत: सहायक है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में जैविक खेती की विधि और भी अधिक लाभदायक है । जैविक विधि द्वारा खेती करने से उत्पादन की लागत तो कम होती ही है इसके साथ ही कृषक भाइयों को आय अधिक प्राप्त होती है तथा अंतराष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पाद अधिक खरे उतरते हैं। जिसके फलस्वरूप सामान्य उत्पादन की अपेक्षा में कृषक भाई अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। आधुनिक समय में निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या, पर्यावरण प्रदूषण, भूमि की उर्वरा शकि्त का संरक्षण एवं मानव स्वास्थ्य के लिए जैविक खेती की राह अत्यन्त लाभदायक है । मानव जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए नितान्त आवश्यक है कि प्राकृतिक संसाधन प्रदूषित न हों, शुद्ध वातावरण रहे एवं पौषि्टक आहार मिलता रहे, इसके लिये हमें जैविक खेती की कृषि पद्धतियाँ को अपनाना होगा जोकि हमारे नैसर्गिक संसाधनों एवं मानवीय पर्यावरण को प्रदूषित किये बगैर समस्त जनमानस को खाद्य सामग्री उपलब्ध करा सकेगी तथा हमें खुशहाल जीने की राह दिखा सकेगी।